☸️मंडनमिश्र☸️

 मंडनमिश्र - ई. 7 वीं शती का उत्तरार्ध । कुमारिल भट्ट के

शिष्य। पिता- हिममित्र । शुल्क यजुर्वेदी काण्वशाखीय ब्राह्मण ।

कोई इन्हें मिथिला का तो कोई महिष्मती का (मध्यप्रदेश में

नर्मदा के तट पर बसा हुआ महेश्वर नामक स्थान) निवासी

बतलाते हैं। शोण नदी के तीर पर रहने वाले विष्णुमित्र नामक

विद्वान् ब्राह्मण की विदुषी कन्या अंबा इनकी पत्नी थी। उस

विदुषी को लोग 'भारती' के नाम से पहिचानते थे। इनके

पुत्र जयमिश्र भी मीमांसा दर्शन के प्रकांड पंडित थे। ये

वैदिक कर्मकाण्ड के निष्ठावान् उपासक थे। तत्कालीन कर्मकांडी

मीमांसक पंडितों में इनका स्थान सर्वश्रेष्ठ था।

ये

आद्य शंकराचार्य के समकालीन थे। इन्होंने मीमांसा-दर्शन

पर निम्न ग्रंथों की रचना की है

1. विधिविवेक - इसमें विध्यर्थ का अनेक पहलुओं से विचार

किया गया है।

2. भावनाविवेक - इसमें आर्थी भावना की विस्तारपूर्वक

मीमांसा है।

3. विभ्रमविवेक- इसमें पांच ख्यातियों का विवरण है।

4. मीमांसासूत्रानुक्रमणी इसमें मीमांसासूत्रों की श्लोकों में

संक्षिप्त व्याख्या है। इन्होंने वेदांत पर ब्रह्मसिद्धि तथा स्फोटसिद्धि

नामक दो और ग्रंथ लिखे हैं। दोनों ग्रंथों में अद्वैत तत्त्वज्ञान

के सिद्धान्तों की चर्चा है। जीवन के पूर्वार्ध में मीमांसा तत्त्वज्ञान

के अनुसार इनका आचार-विचार रहा, परंतु उत्तरार्ध में शंकराचार्य

की प्रेरणा से ये वेदान्तनिष्ठ बने।

शंकराचार्य से संन्यास धर्म की दीक्षा ग्रहण करने पर ये

सुरेश्वराचार्य के नाम से विख्यात हुए परंतु कुछ विद्वानों का

मत है कि मंडन मिश्र और सुरेश्वराचार्य भिन्न व्यक्ति है।

मंडन-मिश्र और शंकराचार्य के वाद-विवाद की आख्यायिका

सुप्रसिद्ध है। एक बार जब शंकराचार्य की कुमारिल भट्ट से

भेंट हुई, तब उन्होंने अपना ब्रह्मसूत्र पर लिखा हुआ भाष्य

कुमारिल भट्ट को दिखाया। कुमारिल भट्ट ने आचार्य से कहा

कि वे अपना भाष्य मंडन मिश्र को दिखायें। यदि उन्होंने

उनके अद्वैतसिद्धान्त को मान्यता दे दी, तो उसके विश्वमान्य

होने में कोई अडचन नहीं रहेगी। कुमारिल भट्ट के कथनानुसार

आचार्य अपनी शिष्य-मंडली के साथ माहिष्मती पहुंचे। वहां

मंडन मिश्र का आवास ढूंढने के लिये अकेले ही चल पडे।

मार्ग में एक दासी से आचार्य ने मंडन मिश्र का पता पूछा।

दासी ने आचार्य से कहा कि वे जिस मार्ग से जा रहे है

उसी से आगे जावे तथा जिस प्रासाद के सामने

जगद् ध्रुवं स्याज्जगदध्रुवं स्यात् कीराङ्गना यत्र गिरं गिरन्ति ।

द्वारस्थनीडान्तरसनिरुद्धा जानीहि तन्मण्डनपण्डितौकः ।।

विश्व शाश्वत है या अशाश्वत है (मीमांसकों के मत से

जगत् शाश्वत है तथा वेदांतियों के मत से जगत् अशाश्वत

है) ऐसी चर्चा जिसके द्वार पर टंगे हुए पिंजरे की मैनायें

करती हो, वही आप समझिये कि मंडन पंडित का घर है।

दासी द्वारा बताये गये लक्षण के अनुसार आचार्य मंडन-मिश्र

के घर पहुंचे। उस समय मंडन मिश्र अपने पिता के श्राद्धकर्म

में लगे हुए थे। श्राद्ध के समय यतिदर्शन निषिद्ध माना जाता

है। अतः मंडन मिश्र यतिवेष में आचार्य को देखकर अत्यंत

कुद्ध हुए। दोनो में शाब्दिक नोंकझोंक हुई। अंत में मंडन-मिश्र

ने यति को भिक्षा देने को कहा। तब शंकराचार्य ने कहा,

'मुझे अन्नभिक्षा नहीं, वाद-भिक्षा चाहिये। मंडन मिश्र ने

आचार्य की चुनौती मान ली। शास्त्रार्थ में हार-जीत का निर्णय

करने के लिये वहा उपस्थित व्यास-जैमिनि ने मंडनपत्री भारती

को ही पंच नियुक्त किया। दूसरे दिन दोनों के बीच शास्त्रार्थ

प्रारंभ हुआ। शंकराचार्य ने निम्न प्रमेय रखा :'इस जगत में एक ब्रह्म ही सत्, चित्, निर्मल तथा यथार्थ

वस्तु है। वही ब्रह्म, सौंप पर भासमान होनेवाली रजत की

आभा-सदृश स्वयं जगद्रूप में भासमान है। जैसे सींप की

रजतआभा मिथ्या है, वेसे ही यह जगत् भी मिथ्या है। अतः

ब्रह्मज्ञान आवश्यक है। उस ज्ञान से प्रपंच का विनाश होकर

मनुष्य जगत् के बाह्य जंजाल से मुक्त होगा, अपने विशुद्ध

रूप में प्रतिष्ठित होगा तथा जन्म-मरण के चक्र से अर्थात्

संसारपाश से मुक्त होगा। इस प्रकार मेरा अद्वैत का सिद्धान्त

है। श्रुति इसका प्रमाण है।

अपने सिद्धान्त का मंडन करने के पश्चात् आचार्य ने कहा,

मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि यदि मैं शास्त्रार्थ में पराजित हुआ,

तो में संन्यास धर्म छोडकर गृहस्थाश्रम स्वीकार करूंगा।

इसके बाद मंडनमिश्र ने अपना निम्नलिखित प्रमेय प्रतिपादित

वेदों का कर्मकांड ही प्रमाण है। ज्ञानकाण्ड (उपनिषद्)

को मै प्रमाण नहीं मानता क्यों कि वह चैतन्यस्वरूप ब्रह्म का

प्रतिपादन कर, सिद्धवस्तुओं का वर्णन करता है। विधि का

प्रतिपादन ही वेदों का तात्पर्य है। परंतु उपनिषद् विधि का

वर्णन न कर केवल ब्रह्मस्वरूप का ही प्रतिपादन करते हैं।

इसलिये प्रमाणकोटि में नहीं गिने जा सकते । शब्दों की शक्ति

कार्यमात्र के प्रकटन में है तथा दुःख से मुक्ति कर्म द्वारा ही

संभव है। इसलिये प्रत्येक मनुष्य को जीवन भर कर्मानुष्ठान

में रत रहना चाहिये। यह मेरा वेदोक्त सिद्धांत है। इसके

पश्चात् मंडन-मिश्र ने कहा, 'मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि यदि मै

शास्त्रार्थ में हार गया, तो में गृहस्थाश्रम का त्याग कर सन्यास

धर्म ग्रहण करूंगा'।

शास्त्रार्थ में मंडन मिश्र की हार हुई। उनकी धर्मपत्नी भारती

ने आचार्य की विजय की घोषणा की तथा शंकराचार्य से

कहा, 'मेरे पति को शा्त्रार्थ में पराजित करने मात्र से आपको

पूर्ण विजय प्राप्त नहीं होगी, मैं उनकी अर्धांगी हूं, अतः

मुझसे शास्त्रार्थ कर यदि मुझे भी हरा सके तो ही आपकी

जीत पूर्ण होगी।'

शंकराचार्य ने भारती का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। बहुत

समय तक दोनों के बीच शास्त्रार्थ चलता रहा। अंत में भारती

ने आचार्य से कामशास्त्रविषयक प्रश्न पूछकर आचार्य को '

निरुत्तरित कर दिया। तब आचार्य ने प्रश्न का उत्तर देने के

लिये 6 मास का समय मांगा। इस बीच उन्होंने परकाया-प्रवेश

कर कामशास्त्रविषयक ज्ञान प्राप्त किया ओर प्रत्यावर्तन कर

भारती को उस शास्त्र में भी हराया। इसके पश्चात् मंडन मिश्र

ने शंकराचार्य से संन्यास- धर्म की दीक्षा ग्रहण की और

उनके कार्य में जुट गए।


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