मंत्र6️⃣7️⃣8️⃣9️⃣🔟

 अर्थात् लोकसंग्रह करता हुआ और बारंबार उनको उत्साह देता है और पूर्व से उत्तर समुद्र तक शीघ्र ही पहुंचता है।6 ।

जो ज्ञानामृत के केन्द्रस्थान में गर्भरूप रहकर ब्रह्मचारी हुआ।वही ज्ञान, कर्म, जनता, प्रजापालक राजा और विशेष तेजस्वी परमेष्ठी परमात्मा को प्रकट करता हुआ, अब इन्द्र बनकर निश्चय से असुरों का नाश करता है।7।

तेज से प्रकाशित कृष्णचर्म धारण करता हुआ, व्रत के अनुकूल आचरण करने वाला और बड़ी-बड़ी दाढ़ी मूंछ धारण करने वाला ब्रह्मचारी प्रगति करता है। वह लोगों को एकत्रित करता हुआ ये बड़े गम्भीर दोनों लोक पृथिवी और धुलोक आचार्य ने बनाये हैं। ब्रह्मचारी अपने तप से उन दोनों का रक्षण करता है।इसलिये उस ब्रह्मचारी के अन्दर सब देव अनुकूल मन के साथ रहते हैं।8।

पहले ब्रह्मचारी ने इस विस्तृत भूमि की तथा धुलोक की भिक्षा प्राप्त की है। अब वह ब्रह्मचारी उनकी दो समिधाएं करके उपासना करता है; क्योंकि उन दोनों के बीच में सब भुवन स्थापित है।।9

एक पास है और दूसरा द्युलोक के पृष्ठभाग से परे है। ये दोनों कोश ज्ञानी की बुद्धि में रख्खे हैं। उन दोनों कोशों का संरक्षण ब्रह्मचारी अपने तप से करता है तथा वही विद्वान ब्रह्मचारी ब्रह्मज्ञान विस्तृत करता है, ज्ञान फैलाता है।10।

Comments

Popular posts from this blog

ईशावास्योपनिषद 18 मंत्र

भारवि और उनके किरातार्जुनीयम् का परिचय

महाकवि दण्डी का व्यक्तित्व एवं कृतित्व जीवन-चरित-