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भारतीय स्थापत्य कला और निर्माणकर्ता

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चार युगों के बारे मे जाने

 युग हिंदू सभ्यता के अनुसार पुराणों में चार युगों के बारे में बताया गया है। 1. सतयुग           2. त्रेता युग 3. द्वापर युग       4. कलयुग इसमें हर युग को युग से खराब बताया गया है। कहा गया है कि जब एक युग के बाद दूसरा युग आरंभ होता है, नैतिक मूल्यों और सामाजिक मानदंडों का पतन हो जाता है। इतिहास में युगों के काल, स्थान का विशेष महत्व किया गया है।        युग       अवतार            जीवों का विकास 1. सतयुग मत्स्य अवतार      मछली : जलीय जीव कूर्म अवतार         कछुआ : उभयचर वराह अवतार       सूअर : थल का पशु नरसिंह अवतार    अर्ध्दमानव : पशु व मानव के                                              बीच का जीव 2. त्रेतायुग वामन अवतार      बौना : लघु मानव परशुराम अवतार  शस्त्र...

रस, रस के प्रकार

 रस कविता के पढने और नाटक को देखने से पाठक और श्रोता को जिस आन्नद की अनुभूति होती है, उसे ही रस कहा जाता है। रस से पूर्ण वाक्य ही काव्य कहलाता है। रस को ही काव्य की आत्मा कहते है। भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र मे लिखा है- “विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्ति” अर्थात विभाव, अनुभाव और संचारी भावों के संयोग से रस बनता है। इसके के मुख्य तत्व निम्न है- १. स्थायी भाव    २. विभाव    ३. अनुभाव    ४. संचारी भाव स्थायी भाव- मनुष्य के हृदय मे कुछ भाव स्थायी रूप से रहते है, इन्हे ही स्थायी भाव कहा जाता है। ये मुख्यतः 9 होते है। रति – श्रंगार हास – हास्य शोक – करूण उत्साह – वीर क्रोध – रौद्र भय  – भयानक जुगुत्सा – वीभत्स विस्मय – अद्भुत निर्वेद – शान्त विभाव-🌺 रसों को उद्दीप्त या उदित करने वाले तत्वो को विभाव कहते है। इसके तीन भेद है- आलम्बन, उद्दीपन, आश्रय । अनुभाव –🌺 मन के भाव को व्यकत करने वाली शारीरिक या मानसिक क्रिया को अनुभाव कहते है। संचारी भाव –🌺 वे भाव जो मन मे अल्प काल के लिए आकर चले जाते है , संचारी भाव कहलाते है। स्थायी भाव को पूर्ण करके क्षण भर ...

शब्द परिभाषा तथा प्रकार

 शब्द🌺 दो वर्णो के मेल से बनने वाले स्वतन्त्र और सार्थक ध्वनि को शब्द कहते है। भाषाविदो के अनुसार अर्थ के लिए यह भाषा की सबसे छोटी स्वतन्त्र इकाई है।                       शब्द के भेद मुख्य रूप से चार आधारों पर वर्गीकृत किया जाता है- 1. रचना के  आधार पर 2. अर्थ के आधार पर 3. उत्पत्ति के आधार पर 4. रूपान्तर के आधार              1. रचना के आधार पर- रचना के आधार पर तीन प्रकार है- १. रूढ़    २.यौगिक    ३. योगरूढ़ १. रूढ़ – जिनका कोई खण्ड सार्थक नही होता है, लेकिन वे परम्परागत रूप से विशेष अर्थ प्रदान करते है। रूढ कहलाते है। जैसे- पानी, हाथी, घोड़ा आदि। २. यौगिक- दो सार्थक खण्डो से मिलकर बना होता है, यौगिक कहलाते है। जैसे- विद्यालय – विद्या + आलय रामायण – राम + अयण ३. योगरूढ़- वैसे शब्द जो यौगिक होते है, पर अपना सामान्य अर्थ त्याग कर विशेष अर्थ ग्रहण कर लेते है। योगरूढ़ कहलाते है। जैसे- लम्बोदर – गणेश दिनकर- सूर्य                 ...

🌺 संस्कृत की लिपि 🌺

 🌺 संस्कृत की लिपि 🌺 मोहनजोदडो और हडप्पा में जो प्राचीनतम सामप्री प्राप्त हुई उसमें कुछ लेख भी हैं। ये ऐसी लिपि में हैं जो ब्राह्मी या खरोष्ट्री (जो भारत की प्राचीनतम लिपियां मानी गई. हैं) से मेल नहीं खाती। उस लिपि का वाचन करने का प्रयास कुछ विद्वानों ने किया, परंतु उनके वाचन में एकवाक्यता न होने के कारण, वह लिपि अभी तक अवाचित ही मानी जाती है। अजमेर जिले के बडली या बर्ली गांव में और नेपाल की तराई में पिप्रावा नामक स्थान में दो छोटे छोटे शिलालेख मिले हैं। उनके अक्षर पढे गए हैं, परंतु जिस लिपि में वे लिखे गए है वह सम्राट अशोक से पूर्वकालीन मानी गई है। वैदिक वाङ्मय, त्रिपिटक साहित्य, जैन ग्रंथ, पाणिनि की अष्टाध्यायी इत्यादि प्राचीन प्रमाणों से प्राचीन भारत की लेखनकला का अस्तित्व प्रतीत होता है और उन प्रमाणों से भारत को लिपिज्ञान पाश्चात्य या चीनी सभ्यता के संपर्क से प्राप्त हुआ इस प्रकार के यूरोपीय विद्वानों के मत का खंडन होता है। जैनों के पन्नवणासूत्र में और समवायंग सूत्र में 18 लिपियों के नाम मिलते हैं। बौद्धों के ललितविस्तर में 64 लिपियों के नाम आए हैं, जिनमें ब्राह्मी और खरोष्ट्...

संस्कृत भाषा का समपूर्ण इतिहास,,

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 संस्कृत भाषा संस्कृत शब्द का प्रयोग अनेकविध अर्थों में संस्कृत साहित्य में किया गया है। उन सभी प्रयोगों में सुशोभित करना, अलंकृत करना, पवित्र करना, प्रशिक्षित करना, सतेज करना, निर्दोष करना, इत्यादि भाव व्यक्त होते हैं। जब किसी भाषा को संस्कृत विशेषण लगाया जाता है, तब यह अर्थ माना जाता है कि वह भाषा अर्थात् उस भाषा के बहुत से शब्द, निश्चित अर्थ व्यक्त करने की दृष्टि से भाषा शास्त्रीय पद्धति के अनुसार विवेचन कर, निर्दोष किए गए हैं। उन शब्दों में स्वर, व्यंजन, हस्व, दीर्घ इत्यादि किसी प्रकार की विकृतता सदोषता बाकी नहीं रही। बहुतांश शब्दों का निरुक्ति व्युत्पत्ति आदि दृष्टि से पूर्णतया संशोधन करने के कारण, संपूर्ण भाषा में जो परिपूर्णता, परिपक्वता या विशुद्धता निर्माण हुई, उसी कारण भारतीय मनीषियों ने अपनी संस्कापूत भाषा की स्तुति, “दैवी वाक्' (संस्कृतं नाम दैवी वाक्) (काव्यादर्श- 1-33) इस अनन्य साधारण विशेषण से की। देवभाषा, अमरभाषा, गीर्वाणवाणी, अमृतवाणी, सुरभारती, इत्यादि संस्कृत भाषा के निर्देशक अनेकविध रूढ शब्दप्रयोग, इस भाषा की संस्कारपूर्तता के कारण निर्माण हुई अपूर्वताअद्भुतता.,...
 छठा अध्यायसंपादित करें छठा अध्याय आत्मसंयम योग है जिसका विषय नाम से ही प्रकट है। जितने विषय हैं उन सबसे इंद्रियों का संयम-यही कर्म और ज्ञान का निचोड़ है। सुख में और दुख में मन की समान स्थिति, इसे ही योग कहते हैं। सातवें अध्यायसंपादित करें की संज्ञा ज्ञानविज्ञान योग है। ये प्राचीन भारतीय दर्शन की दो परिभाषाएँ हैं। उनमें भी विज्ञान शब्द वैदिक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण था। सृष्टि के नानात्व का ज्ञान विज्ञान है और नानात्व से एकत्व की ओर प्रगति ज्ञान है। ये दोनों दृष्टियाँ मानव के लिए उचित हैं। इस प्रसंग में विज्ञान की दृष्टि से अपरा और परा प्रकृति के इन दो रूपों की जो सुनिश्चित व्याख्या यहाँ गीता ने दी है, वह अवश्य ध्यान देने योग्य है। अपरा प्रकृति में आठ तत्व हैं, पंचभूत, मन, बुद्धि और अहंकार। जिस अंड से मानव का जन्म होता है। उसमें ये आठों रहते हैं। किंतु यह प्राकृत सर्ग है अर्थात् यह जड़ है। इसमें ईश्वर की चेष्टा के संपर्क से जो चेतना आती है उसे परा प्रकृति कहते हैं; वही जीव है। आठ तत्वों के साथ मिलकर जीवन नवाँ तत्व हो जाता है। इस अध्याय में भगवान के अनेक रूपों का उल्लेख कि...